नई दिल्ली/कैनबरा: दक्षिण प्रशांत क्षेत्र में भू-राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया और फिजी के बीच होने जा रहा एक ऐतिहासिक सुरक्षा समझौता न केवल चीन की रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं को चुनौती देगा, बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए भी एक बड़ा अवसर लेकर आ सकता है। ताजा रिपोर्ट्स के अनुसार, इस सप्ताह ऑस्ट्रेलिया और फिजी के बीच प्रस्तावित “वाले यूनियन” समझौते पर हस्ताक्षर हो सकते हैं, वहीं भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच लंबे समय से लंबित यूरेनियम सप्लाई समझौते को भी अंतिम रूप मिलने की संभावना है।
ऑस्ट्रेलिया-फिजी का ‘वाले यूनियन’ समझौता क्या है?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज फिजी की यात्रा पर जा रहे हैं, जहां वे फिजी के नेतृत्व के साथ “वाले यूनियन” नामक एक महत्वपूर्ण सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर करेंगे। फिजी की स्थानीय भाषा में “वाले” का अर्थ परिवार होता है, लेकिन रणनीतिक दृष्टिकोण से यह समझौता ऑस्ट्रेलिया और फिजी के बीच गहरे सुरक्षा सहयोग का प्रतीक माना जा रहा है। यह समझौता ऑस्ट्रेलिया की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत वह प्रशांत क्षेत्र के देशों जैसे पापुआ न्यू गिनी, तुवालू, नौरू और इंडोनेशिया के साथ अपने सुरक्षा संबंधों को मजबूत कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम सीधे तौर पर प्रशांत महासागर में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने की कोशिश है।
चीन की बढ़ती सक्रियता के बाद बदली रणनीति
साल 2022 में चीन और सोलोमन आइलैंड्स के बीच हुए सुरक्षा समझौते ने अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया की चिंताओं को बढ़ा दिया था। पश्चिमी देशों को आशंका थी कि चीन भविष्य में प्रशांत क्षेत्र के छोटे द्वीपीय देशों में सैन्य ठिकाने स्थापित कर सकता है। इसी पृष्ठभूमि में ऑस्ट्रेलिया ने अपनी क्षेत्रीय सुरक्षा नीति को और आक्रामक बनाया है। फिजी के साथ होने वाला नया समझौता ऑस्ट्रेलिया को वहां की सुरक्षा, पुलिसिंग और रणनीतिक सहयोग में महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान करेगा। यदि फिजी की सुरक्षा को कोई चुनौती मिलती है, तो ऑस्ट्रेलिया सैन्य और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने वाले प्रमुख देशों में शामिल होगा।
भारत-ऑस्ट्रेलिया यूरेनियम डील को मिल सकती है अंतिम मंजूरी
दूसरी ओर, भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच बहुप्रतीक्षित यूरेनियम आपूर्ति समझौते को भी जल्द अंतिम रूप मिलने की संभावना जताई जा रही है। आगामी उच्चस्तरीय बैठकों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज के बीच इस मुद्दे पर महत्वपूर्ण चर्चा हो सकती है। ऑस्ट्रेलिया दुनिया के कुल ज्ञात यूरेनियम भंडार का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा रखता है। हालांकि, लंबे समय तक ऑस्ट्रेलिया ने भारत को यूरेनियम निर्यात करने से इनकार किया था, क्योंकि भारत ने परमाणु अप्रसार संधि (NPT) पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं।
कैसे खुला भारत के लिए यूरेनियम का रास्ता?
साल 2008 में भारत को वैश्विक परमाणु व्यापार में विशेष छूट मिलने के बाद स्थिति बदली। इसके बाद 2014 में दोनों देशों के बीच यूरेनियम निर्यात को लेकर समझौते पर हस्ताक्षर हुए, लेकिन तकनीकी और सुरक्षा मानकों से जुड़े मुद्दों के कारण इसका पूर्ण क्रियान्वयन नहीं हो सका। अब रिपोर्ट्स के अनुसार, दोनों देशों ने सुरक्षा और निगरानी से जुड़े अधिकांश तकनीकी मुद्दों को सुलझा लिया है। इससे निकट भविष्य में भारत को ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम की नियमित आपूर्ति शुरू होने का रास्ता साफ हो सकता है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह डील?
भारत तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है और उसे आने वाले दशकों में भारी मात्रा में ऊर्जा की आवश्यकता होगी। वर्तमान में भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा कोयले पर निर्भर है, जिससे पर्यावरणीय चुनौतियां भी पैदा होती हैं। भारत ने वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य तय किया है। इस लक्ष्य को हासिल करने में परमाणु ऊर्जा की भूमिका बेहद अहम मानी जा रही है। देश में वर्तमान में 22 से अधिक परमाणु रिएक्टर संचालित हैं और कई नई परियोजनाओं पर काम चल रहा है। ऐसे में ऑस्ट्रेलिया से मिलने वाला यूरेनियम भारत की परमाणु ऊर्जा क्षमता को मजबूती देगा और ऊर्जा सुरक्षा को नई दिशा प्रदान करेगा।
चीन के लिए क्यों बढ़ सकती है चिंता?
विश्लेषकों का मानना है कि ऑस्ट्रेलिया-फिजी सुरक्षा समझौता और भारत-ऑस्ट्रेलिया यूरेनियम सहयोग, दोनों ही इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं। एक ओर ऑस्ट्रेलिया प्रशांत क्षेत्र में अपनी सुरक्षा उपस्थिति मजबूत कर रहा है, वहीं दूसरी ओर भारत के साथ ऊर्जा और रणनीतिक साझेदारी को नई ऊंचाई पर ले जाया जा रहा है।


