विदेश मंत्रालय (MEA) को दिल्ली हाई कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। अदालत ने अबू धाबी (UAE), कुवैत, सिंगापुर और कैनबरा (ऑस्ट्रेलिया) स्थित भारतीय मिशनों में कॉन्सुलर, पासपोर्ट और वीज़ा (CPV) सेवाओं के आउटसोर्सिंग के लिए अपनाई गई तकनीकी मूल्यांकन प्रक्रिया को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि पूरी प्रक्रिया में मनमानेपन, पारदर्शिता की कमी और तर्कसंगत मूल्यांकन का अभाव दिखाई देता है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत स्वीकार्य नहीं है।
एक महीने में नए RFP जारी करने का निर्देश
जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस शैल जैन की डिवीजन बेंच ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह एक महीने के भीतर चारों भारतीय मिशनों के लिए नए रिक्वेस्ट फॉर प्रपोज़ल (RFP) जारी करे और नई निविदा प्रक्रिया को जल्द से जल्द पूरा करने के लिए गंभीर प्रयास करे। अदालत ने इस दौरान मौजूदा सेवा प्रदाताओं को सेवाएं जारी रखने की अनुमति दी, ताकि पासपोर्ट, वीज़ा और कॉन्सुलर सेवाओं में किसी तरह का व्यवधान न आए।
किन कंपनियों की याचिका पर आया फैसला?
यह फैसला ई ट्रैव टेक लिमिटेड और वेरासिस लिमिटेड की याचिकाओं पर सुनाया गया। दोनों कंपनियों ने दावा किया था कि उन्हें तकनीकी मूल्यांकन में अनुचित तरीके से अयोग्य घोषित किया गया। हाई कोर्ट ने उनकी दलीलों को स्वीकार करते हुए सफल निजी बोलीदाताओं के पक्ष में किए गए निविदा आवंटन को भी निरस्त कर दिया।
कोर्ट ने मूल्यांकन प्रक्रिया में क्या खामियां बताईं?
अदालत ने कहा कि तकनीकी मूल्यांकन के दौरान विभिन्न मानदंडों पर दिए गए अंक न तो तर्कसंगत थे और न ही उनके पीछे कोई स्पष्ट आधार दर्ज किया गया।
कोर्ट के अनुसार—
- मूल्यांकन के कारणों का रिकॉर्ड नहीं रखा गया।
- बोलीदाताओं को कम अंक दिए जाने की वजह नहीं बताई गई।
- तुलनात्मक मूल्यांकन के मानक सार्वजनिक नहीं किए गए।
- समान दस्तावेज प्रस्तुत करने वाले बोलीदाताओं को अलग-अलग अंक दिए गए।
- कई मामलों में निर्धारित पात्रता पूरी होने के बावजूद शून्य अंक दिए गए।
अदालत ने कहा कि केवल अंक जारी कर देना पर्याप्त नहीं है। यदि अंक देने के पीछे का आधार और मूल्यांकन प्रक्रिया स्पष्ट नहीं होगी, तो पूरी प्रक्रिया अपारदर्शी और मनमानी मानी जाएगी।
वित्तीय नियमों के उल्लंघन पर भी टिप्पणी
दिल्ली हाई कोर्ट ने माना कि विदेश मंत्रालय और संबंधित भारतीय मिशनों ने सामान्य वित्तीय नियम (GFR), 2017 के नियम 173(iv) और 189 का पालन नहीं किया। अदालत के मुताबिक, बोलीदाताओं की अयोग्यता के कारण दर्ज नहीं किए गए और उन्हें समय पर सूचित भी नहीं किया गया।
केंद्र सरकार की आपत्ति भी खारिज
केंद्र सरकार ने दलील दी थी कि याचिकाएं पहले दायर की जानी चाहिए थीं, इसलिए वे सुनवाई योग्य नहीं हैं। हालांकि अदालत ने इस आपत्ति को खारिज करते हुए कहा कि मई 2026 में मापदंड-वार अंक सार्वजनिक होने के बाद ही याचिकाकर्ताओं को मूल्यांकन प्रक्रिया की वास्तविक स्थिति का पता चला। इसलिए चुनौती का नया कारण उसी समय उत्पन्न हुआ।
न्यायिक समीक्षा पर हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी
अदालत ने कहा कि टेंडर मामलों में न्यायिक समीक्षा का उद्देश्य तकनीकी विशेषज्ञों के निर्णय को बदलना नहीं होता, बल्कि यह सुनिश्चित करना होता है कि पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और भेदभाव रहित हो। कोर्ट ने कहा कि यदि मूल्यांकन के लिए वस्तुनिष्ठ मानक, दर्ज कारण और स्पष्ट तुलनात्मक आधार मौजूद नहीं होंगे, तो सार्वजनिक खरीद प्रक्रिया में समान अवसर की संवैधानिक गारंटी प्रभावित होगी।


