नई दिल्ली। गृहिणियों के योगदान को नई पहचान देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि उन्हें केवल “होममेकर” नहीं बल्कि “Nation Builder” कहा जाना चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि घर और परिवार की देखभाल में महिलाओं का योगदान किसी नियमित आय अर्जित करने वाले सदस्य से कम नहीं है, इसलिए सड़क दुर्घटना मामलों में उनके निधन पर मुआवजे का निर्धारण करते समय उनके घरेलू श्रम को उचित महत्व दिया जाना चाहिए। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि गृहिणियों के काम का आर्थिक मूल्य तय करना आसान नहीं है, क्योंकि उनका योगदान परिवार की नींव को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाता है। अदालत ने कहा कि यदि घर में किए जाने वाले सभी कार्यों का अलग-अलग मूल्यांकन किया जाए तो उनका योगदान बेहद महत्वपूर्ण और अमूल्य साबित होगा।
20 साल पुराने मामले में आया फैसला
मामला वर्ष 2006 में उत्तराखंड में हुए एक सड़क हादसे से जुड़ा है, जिसमें एक महिला की मौत हो गई थी। मुआवजे की राशि तय करते समय महिला की काल्पनिक आय को दिहाड़ी मजदूर से भी कम माना गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस दृष्टिकोण पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि गृहिणी के श्रम का इतना कम मूल्यांकन स्वीकार नहीं किया जा सकता।
बढ़ाया गया मुआवजा
अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान कई तथ्यात्मक त्रुटियों पर भी नाराजगी जताई। इसके बाद पीठ ने मृतक महिला के परिवार को दिए जाने वाले मुआवजे को 2.5 लाख रुपये से बढ़ाकर 6 लाख रुपये कर दिया और छह सप्ताह के भीतर भुगतान का निर्देश दिया।
क्यों खास है यह फैसला?
यह फैसला केवल मुआवजा बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि देशभर की लाखों गृहिणियों के अवैतनिक श्रम को कानूनी मान्यता देने वाला महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अदालत का यह निर्णय भविष्य में मोटर दुर्घटना दावों से जुड़े मामलों में गृहिणियों के योगदान के मूल्यांकन के लिए अहम मिसाल बनेगा।


