नई दिल्ली: IPAC से जुड़े मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। अदालत ने ईडी अधिकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर पर फिलहाल रोक लगा दी है। साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि मामले से जुड़े सभी रिकॉर्ड, विशेष रूप से सीसीटीवी फुटेज, सुरक्षित रखे जाएं। इस केस की अगली सुनवाई 3 फरवरी को तय की गई है।सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किए हैं, जिनमें पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, राज्य के डीजीपी, पश्चिम बंगाल सरकार और कोलकाता के पुलिस कमिश्नर शामिल हैं।
हाईकोर्ट में सुनवाई प्रभावित करने का आरोप
ईडी ने अदालत को बताया कि उसने पहले इस विवाद को लेकर कलकत्ता हाईकोर्ट का रुख किया था। लेकिन सुनवाई से पहले ही कथित तौर पर तृणमूल कांग्रेस (TMC) की लीगल सेल द्वारा व्हाट्सएप के जरिए लोगों से कोर्ट परिसर में इकट्ठा होने की अपील की गई। ईडी का दावा है कि “लीगल माइंड” नामक एक व्हाट्सएप ग्रुप में संदेश साझा किए गए, जिनका उद्देश्य सुनवाई के दौरान हंगामा खड़ा करना था ताकि अदालत में एजेंसी की याचिका पर सुनवाई टल सके। ईडी ने इन दावों के समर्थन में चैट के स्क्रीनशॉट भी सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पेश किए।
ईडी की दलीलें क्या रहीं?
अदालत ने सॉलिसिटर जनरल (SG) की दलीलों को अपने आदेश में दर्ज किया। ईडी ने बताया कि वह वर्ष 2020 से एक बड़े घोटाले की जांच कर रही है। जांच के दौरान खुफिया सूचनाएं मिलीं कि करीब 20 करोड़ रुपये की अपराध से अर्जित आय (POC) आर. कांतिलाल की एक फर्म को भेजी गई, जिसे आगे IPAC फ्रेमवर्क के तहत काम करने वालों तक पहुंचाया गया। ईडी के अनुसार, जब एजेंसी तलाशी अभियान चला रही थी, उसी दौरान कोलकाता के आईपीएस डिप्टी पुलिस कमिश्नर और पुलिस कमिश्नर मौके पर पहुंच गए। एजेंसी का आरोप है कि जांच में हस्तक्षेप न करने के अनुरोध के बावजूद स्वयं मुख्यमंत्री भी परिसर में दाखिल हो गईं, जबकि यह कार्रवाई पीएमएलए कानून के तहत की जा रही थी।
“यह पहली बार नहीं है” — ईडी
ईडी ने सुप्रीम कोर्ट को यह भी बताया कि इस तरह की घटनाएं पहले भी हो चुकी हैं। एजेंसी का दावा है कि जब केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) जांच कर रही थी, तब भी इसी तरह का हस्तक्षेप देखने को मिला था। इससे केंद्रीय एजेंसियों की जांच में बाधा डालने का एक पैटर्न सामने आता है। इसके अलावा, ईडी का आरोप है कि जांच के दौरान एकत्र किए गए दस्तावेज और सामग्री को अवैध रूप से हटा लिया गया और बाद में पश्चिम बंगाल पुलिस ने उल्टा ईडी अधिकारियों के खिलाफ ही एफआईआर दर्ज कर ली। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि सॉलिसिटर जनरल के अनुसार, इतने बड़े घोटालों से जुड़े मामलों में इस तरह की परिस्थितियां केंद्रीय जांच एजेंसियों के लिए निष्पक्ष जांच को बेहद कठिन बना देती हैं।


