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पंडित दीनदयाल उपाध्याय पुण्यतिथि: रहस्यमयी मौत और अमर विचारों की कहानी

जनसंघ से भाजपा तक: दीनदयाल उपाध्याय की वैचारिक विरासत

भारतीय राजनीति के वैचारिक स्तंभों में पंडित दीनदयाल उपाध्याय का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। 11 फरवरी 1968 को उनका निधन हुआ था, लेकिन उनका जीवन, विचार और रहस्यमयी मृत्यु आज भी लोगों के मन में कई सवाल छोड़ जाते हैं। उनकी पुण्यतिथि पर आइए जानते हैं उनके जीवन और योगदान से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं को एक नए नजरिए से।

राष्ट्रवादी विचारधारा के मजबूत स्तंभ

पंडित दीनदयाल उपाध्याय भारतीय जनसंघ के सह-संस्थापक थे और उन्होंने “एकात्म मानववाद” जैसी मौलिक विचारधारा देश को दी। उनका मानना था कि राजनीति का उद्देश्य केवल सत्ता पाना नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुँचाना होना चाहिए। बाद में जब जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हुआ और उससे आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ, तो उसमें भी उनकी सोच की झलक साफ दिखाई देती है। इसी कारण कई लोग उन्हें भाजपा का “वैचारिक मार्गदर्शक” मानते हैं।

अध्यक्ष बनने के बाद बदली जिम्मेदारियां

दीनदयाल उपाध्याय ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में जनसंघ का अध्यक्ष पद संभाला था। कहा जाता है कि उन्होंने संगठन को जमीनी स्तर तक मजबूत करने की योजना बनाई थी। उनके समर्थकों का मानना है कि यदि वे कुछ वर्ष और जीवित रहते, तो भारतीय राजनीति की दिशा और दशा काफी अलग हो सकती थी।

उस दौर की राजनीतिक उथल-पुथल

1960 के दशक का समय भारत के लिए बेहद संवेदनशील था।

  • मई 1964 में पंडित जवाहरलाल नेहरू का निधन हुआ।
  • इसके बाद लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने, लेकिन ताशकंद समझौते के बाद उनका भी आकस्मिक निधन हो गया।
  • फिर इंदिरा गांधी ने देश की बागडोर संभाली।
    इन घटनाओं के बीच देश राजनीतिक अस्थिरता से गुजर रहा था।

रहस्यमयी मृत्यु

11 फरवरी 1968 को वाराणसी के पास मुगलसराय जंक्शन पर पंडित दीनदयाल उपाध्याय का शव संदिग्ध परिस्थितियों में मिला। शुरुआती जांच में इसे चोरी के दौरान हुई हत्या बताया गया, लेकिन सच्चाई कभी पूरी तरह सामने नहीं आ सकी। आज भी उनकी मौत को भारतीय राजनीति के सबसे बड़े अनसुलझे रहस्यों में गिना जाता है।

विरासत जो आज भी जीवित है

दीनदयाल उपाध्याय भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके विचार आज भी करोड़ों लोगों को प्रेरित करते हैं। उनका सपना था एक ऐसा भारत, जहां विकास का लाभ हर व्यक्ति तक पहुंचे—और यही सोच उन्हें आधुनिक भारत के महान चिंतकों में शामिल करती है।

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