दक्षिणी अफ्रीका में भीषण बारिश और बाढ़ से भारी नुकसान
जोहान्सबर्ग: दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मौसम अब सिर्फ चर्चा का विषय नहीं रहा, बल्कि एक गंभीर संकट बन चुका है। कहीं भीषण तूफान, कहीं रिकॉर्डतोड़ बर्फबारी, तो कहीं जानलेवा गर्मी और मूसलाधार बारिश ने आम जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि इन असामान्य मौसमी घटनाओं के पीछे सबसे बड़ा कारण मानव-जनित जलवायु परिवर्तन है। इसी कड़ी में सामने आए एक नए शोध में खुलासा हुआ है कि इंसानों की गतिविधियों से पैदा हुए जलवायु परिवर्तन ने दक्षिणी अफ्रीका में हालिया बारिश और बाढ़ को पहले से कहीं ज्यादा विनाशकारी बना दिया। इस आपदा में अब तक 100 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है, जबकि करीब 3 लाख लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हो गए हैं।
10 दिन में बरसी साल भर की बारिश
वर्ल्ड वेदर एट्रीब्यूशन (WWA) द्वारा किए गए अध्ययन में दक्षिण अफ्रीका, मोजाम्बिक, जिम्बाब्वे और इस्वातिनी के उन इलाकों का विश्लेषण किया गया, जहां अत्यधिक वर्षा दर्ज की गई। रिपोर्ट के अनुसार, इन क्षेत्रों में सिर्फ 10 दिनों के भीतर उतनी बारिश हो गई, जितनी आमतौर पर पूरे साल में होती है। इस असामान्य बारिश ने घरों, सड़कों, पुलों और अन्य बुनियादी ढांचों को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया है। आर्थिक क्षति का अनुमान लाखों डॉलर में लगाया जा रहा है।
कई इलाके पानी में डूबे
मोजाम्बिक के कई हिस्से पूरी तरह जलमग्न हो गए हैं। वहीं दक्षिण अफ्रीका के लिम्पोपो और म्पुमलांगा प्रांतों में सड़कें और पुल बह गए, जबकि जिम्बाब्वे के कुछ क्षेत्रों में संपर्क पूरी तरह टूट गया।
वैज्ञानिकों की अंतरराष्ट्रीय टीम का अध्ययन
यह अध्ययन दुनियाभर के वैज्ञानिकों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने किया है, जिसमें वैज्ञानिक रूप से मान्य (पीयर-रिव्यूड) तरीकों का इस्तेमाल किया गया। शोध में पाया गया कि पूर्व-औद्योगिक दौर की तुलना में अत्यधिक बारिश की तीव्रता में लगभग 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, और इसकी मुख्य वजह मानव-जनित जलवायु परिवर्तन है। विशेषज्ञों के अनुसार, कमजोर ला-नीना मौसम पैटर्न ने भी इस स्थिति को और गंभीर बना दिया। आमतौर पर यह पैटर्न दक्षिणी अफ्रीका में नमी बढ़ाता है, लेकिन बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण अब इसके प्रभाव कहीं अधिक खतरनाक हो गए हैं।
“सामान्य बारिश अब बाढ़ में बदल रही है”
रॉयल नीदरलैंड्स मौसम विज्ञान संस्थान के वरिष्ठ जलवायु वैज्ञानिक और अध्ययन के सह-लेखक इजिडीन पिंटो का कहना है कि जीवाश्म ईंधन के लगातार उपयोग से चरम बारिश की घटनाएं और अधिक तीव्र होती जा रही हैं।
उनके मुताबिक, “जो बारिश पहले सामान्य मानी जाती थी, वह अब जानलेवा बाढ़ में तब्दील हो रही है। बारिश की तीव्रता में 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी साफ तौर पर मानव-जनित जलवायु परिवर्तन का नतीजा है।”
वैज्ञानिक भी रह गए हैरान
दक्षिणी अफ्रीका के देश पहले भी भारी बारिश और बाढ़ का सामना करते रहे हैं, लेकिन हालिया घटना ने वैज्ञानिकों को भी चौंका दिया है। मोजाम्बिक मौसम विभाग के शोधकर्ता बर्नाडिनो न्हांटुम्बो के अनुसार, कुछ इलाकों में सिर्फ 2 से 3 दिनों में उतनी बारिश हो गई, जितनी आमतौर पर पूरे मानसून सीजन में होती है। ऐसे हालात में हालात पर काबू पाना बेहद मुश्किल हो जाता है।
नदियों की वजह से बढ़ता खतरा
मोजाम्बिक की भौगोलिक स्थिति भी इस आपदा को और गंभीर बना देती है। देश नौ प्रमुख नदियों के निचले हिस्से में स्थित है, इसलिए भारी बारिश के दौरान नदियों का उफान नुकसान को कई गुना बढ़ा देता है। गाजा प्रांत की राजधानी जाई-जाई और चोकवे शहर सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं।
अफ्रीका के लिए स्थानीय मॉडल की जरूरत
शोधकर्ताओं ने इस बात पर जोर दिया है कि अफ्रीका के लिए विशेष और स्थानीय जलवायु मॉडल विकसित किए जाने चाहिए। इंपीरियल कॉलेज लंदन की प्रोफेसर फ्रीडेरिक ओटो के अनुसार, मौजूदा ज्यादातर जलवायु मॉडल अमेरिका, यूरोप और एशिया में विकसित किए गए हैं, जिससे अफ्रीका के लिए उनकी सटीकता सीमित हो जाती है।


