UGC के समानता नियमों पर क्यों भड़का विवाद? सुप्रीम कोर्ट ने क्यों लगाई रोक
उच्च शिक्षा से जुड़े UGC के नए समानता नियमों पर मचा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। सोमवार को इन नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर Supreme Court of India में सुनवाई हुई। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने फिलहाल इन नियमों के अमल पर रोक लगा दी है और मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को तय की है। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कई अहम और सख्त टिप्पणियां कीं, जिनसे साफ़ संकेत मिला कि न्यायपालिका इस मुद्दे को केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन के नज़रिए से भी देख रही है।
आखिर क्या हैं UGC के नए नियम?
सुप्रीम कोर्ट ने पहले रोहित वेमुला मामले की सुनवाई के दौरान यह निर्देश दिया था कि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए ठोस व्यवस्था बनाई जाए।
इसी के बाद University Grants Commission (UGC) ने नए नियम जारी किए।
इन नियमों के मुख्य बिंदु ये हैं:
- हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में इक्विटी (समता) कमेटी बनाना अनिवार्य
- SC, ST और OBC छात्र जातिगत भेदभाव की शिकायत कर सकेंगे
- कमेटी में SC, ST और OBC प्रतिनिधियों की मौजूदगी जरूरी
- सवर्ण वर्ग के प्रतिनिधि का होना अनिवार्य नहीं
- झूठी शिकायत पर सज़ा का प्रावधान हटाया गया
- शिकायत मिलने पर संस्थान को 15 दिन में सुनवाई करनी होगी
- संतोषजनक कार्रवाई न होने पर संस्थान की फंडिंग रोकी जा सकती है
सवर्ण वर्ग को क्यों है आपत्ति?
इन नियमों के सामने आने के बाद सवर्ण वर्ग के छात्रों और संगठनों ने कड़ा विरोध शुरू कर दिया। उनकी मुख्य आपत्तियां ये हैं:
- नियमों में भेदभाव के शिकार के रूप में सिर्फ SC, ST और OBC को माना गया
- सामान्य वर्ग को किसी भी तरह का संस्थागत संरक्षण नहीं
- सवर्णों को अप्रत्यक्ष रूप से “डिफॉल्ट दोषी” मानने का आरोप
- झूठी शिकायत करने वालों पर कार्रवाई का प्रावधान हटाना
सवर्ण समाज की मांग है कि:
किसी भी जाति के साथ भेदभाव होने पर कार्रवाई हो
फर्जी शिकायत करने वालों को भी सज़ा दी जाए
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कई गंभीर सवाल उठाए:
- क्या हम जातिविहीन समाज की ओर बढ़ रहे हैं या पीछे जा रहे हैं?
- भारत में अमेरिका जैसी सामाजिक परिस्थितियां नहीं बननी चाहिए
- हॉस्टल और कैंपस में छात्र साथ रहते हैं, वहां किसी भी तरह का भेदभाव अस्वीकार्य है
कोर्ट ने कहा कि:
UGC के नियमों की विस्तृत समीक्षा की जाएगी
जरूरत पड़ी तो एक विशेष कमेटी बनाई जा सकती है
केंद्र सरकार से इस पूरे मामले पर जवाब मांगा जाएगा
राजनीति भी हुई तेज़
UGC नियमों को लेकर राजनीतिक बयानबाज़ी भी तेज़ हो गई है। कुछ नेताओं ने इसे समानता के लिए ज़रूरी कदम बताया, तो कुछ ने इसे संविधान की मूल भावना के ख़िलाफ़ करार दिया। यानी मामला अब सिर्फ शिक्षा नीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक बहस का केंद्र बन चुका है।
आगे क्या?
19 मार्च को होने वाली अगली सुनवाई तय करेगी कि UGC के नियमों में संशोधन होगा या पूरी व्यवस्था को नए सिरे से तैयार किया जाएगा


