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महाराष्ट्र की राजनीति का पावर हाउस बुझा: अजीत पवार का विमान हादसे में निधन

अजीत पवार: सत्ता, साहस और सख़्त फैसलों की राजनीति का अंत

महाराष्ट्र की सियासत के सबसे निर्णायक और प्रभावशाली चेहरों में शुमार Ajit Pawar अब हमारे बीच नहीं रहे। बुधवार सुबह बारामती के पास हुए एक दर्दनाक विमान हादसे में 66 वर्षीय अजीत पवार का निधन हो गया। यह केवल एक राजनेता का अंत नहीं, बल्कि उस राजनीतिक शैली का भी अवसान है जिसमें फैसले पल भर में होते थे और अनुशासन सर्वोपरि रहता था। चार जनसभाओं को संबोधित करने के लिए मुंबई से चार्टर्ड Learjet 45 से बारामती रवाना हुए पवार का विमान रनवे के नज़दीक दुर्घटनाग्रस्त हो गया। हादसे के बाद विमान पूरी तरह जलकर नष्ट हो गया। शुरुआती दृश्यों में घटनास्थल से उठती लपटें और धुएँ का घना गुबार दिखाई दिया। मंगलवार को ही उन्होंने मुंबई में कैबिनेट बैठक में हिस्सा लिया था और पुणे से जुड़े नगर निगम चुनावों की तैयारियों को लेकर बैठकों के लिए बारामती जा रहे थे। प्रधानमंत्री Narendra Modi सहित देशभर के नेताओं ने शोक व्यक्त किया और उन्हें “जनता से जुड़े, कामकाजी नेता” के रूप में याद किया।

विरासत, जिम्मेदारी और राजनीति की पाठशाला

22 जुलाई 1959 को जन्मे अजीत पवार के जीवन की दिशा 18 साल की उम्र में ही तय हो गई थी, जब उनके पिता अनंतराव पवार का निधन हुआ। इसके बाद उनके चाचा Sharad Pawar उनके मार्गदर्शक बने। सहकारिता से राजनीति की ओर बढ़ते हुए, 1982 में चीनी सहकारी समिति से शुरू हुआ उनका सफ़र 1991 में बारामती लोकसभा सीट तक पहुँचा। चाचा के लिए सीट खाली कर वे राज्य की राजनीति में लौटे और बारामती विधानसभा से अगले तीन दशकों तक अपराजेय रहे। सहकारी संस्थाओं—चीनी मिलें, दूध संघ और स्थानीय बैंक—उनकी असली पाठशाला रहीं। 1991 में पुणे जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष बने और 16 वर्षों तक इस भूमिका में जमीनी नेटवर्क को मजबूत किया।

सत्ता के गलियारों में ‘फाइलों का जादूगर’

वित्त, सिंचाई और जल संसाधन जैसे अहम विभागों में उनकी पकड़ बेजोड़ मानी जाती थी। सुबह 6 बजे से काम शुरू करने की उनकी आदत ने नौकरशाही को हमेशा अलर्ट रखा। बारामती का आधुनिक बुनियादी ढांचा उनके “काम बोलता है” वाले दर्शन का जीवंत प्रमाण था। नवंबर 2024 में बारामती से आठवीं बार एक लाख से अधिक मतों के अंतर से मिली जीत उनके प्रति जनता के भरोसे की मुहर थी।

बगावत, जोखिम और सत्ता का शिखर

अजीत पवार का करियर साहसिक फैसलों से भरा रहा।

  • 2019 का ‘भोर’ घटनाक्रम: विधानसभा चुनावों के बाद सुबह-सुबह Devendra Fadnavis के साथ शपथ—सरकार 80 घंटे में गिर गई, पर राजनीति की धुरी हिल गई।
  • 2023 का विभाजन: एनसीपी में टूट और सत्ता में प्रवेश—अपने सबसे बड़े राजनीतिक जोखिम के साथ उन्होंने समीकरण बदल दिए।
  • दिसंबर 2024: छठी बार उपमुख्यमंत्री पद की शपथ—यह संदेश साफ़ था कि महाराष्ट्र की सत्ता की गणित में पवार एक स्थायी कारक हैं।

एक अध्याय का अंत

बुधवार की सुबह हुए हादसे ने महाराष्ट्र से वह नेता छीन लिया जिसने गठबंधन युग में भी अपनी शर्तों पर राजनीति की। उनके पीछे पत्नी सुनेत्रा पवार और बेटे पार्थ व जय पवार हैं।
यह सिर्फ़ विदाई नहीं—यह उस दौर का अंत है जहाँ सियासत में सख़्ती, गति और परिणाम साथ चलते थे।

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