अजमेर | अजमेर शरीफ में आज बसंत की सदियों पुरानी सूफी परंपरा पूरी आस्था और गरिमा के साथ निभाई गई। अजमेर शरीफ दरगाह में यह रस्म हजरत सज्जादानशीन साहब के जानशीन हजरत सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती की सदारत में सम्पन्न हुई। दरगाह के निज़ाम गेट से मौरूसी क़व्वालों ने बसंत का गड़बा हाथों में लेकर बसंती कलाम पढ़ते हुए आस्तान-ए-शरीफ़ तक कूच किया। इसके बाद मज़ार-ए-अक़दस पर बसंत पेश की गई और रूहानी माहौल में दुआएँ की गईं।
अपने संबोधन में हजरत सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती साहब ने कहा कि बसंत की यह रस्म भारत की उस साझा संस्कृति का प्रतीक है, जहाँ विभिन्न धर्मों के लोग प्रेम, सम्मान और भाईचारे के साथ एक-दूसरे की परंपराओं को अपनाते हैं। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि हमारी परंपराएँ समाज को जोड़ने वाली कड़ियाँ हैं, जो आपसी सम्मान और सामाजिक सौहार्द को मज़बूत करती हैं। उन्होंने सूफी संतों की शिक्षाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इन्हीं मूल्यों को आगे बढ़ाते हुए दरगाहें आज भी मोहब्बत और अमन का पैगाम देती हैं। भारत को उन्होंने विविधताओं से सजी एक अनमोल माला बताया, जिसकी पहचान उसकी एकता में निहित है।
अंत में उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया कि धर्म के नाम पर नफरत फैलाने वालों के विपरीत, सच्चा धर्म इंसानियत, शांति और दिलों को जोड़ने की सीख देता है। पिछले 800 वर्षों से ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह इसी प्रेम और एकता के संदेश को आगे बढ़ाती आ रही है।


