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कल्याण सिंह: सत्ता नहीं, सिद्धांतों की राजनीति करने वाले ‘हिंदू हृदय सम्राट’

मुख्यमंत्री के रूप में कड़े और ऐतिहासिक फैसले

राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख स्तंभ और उत्तर प्रदेश के दो बार मुख्यमंत्री रहे कल्याण सिंह का जीवन संघर्ष, सिद्धांत और साहस की मिसाल रहा। 5 जनवरी 1932 को जन्मे कल्याण सिंह ने सत्ता से अधिक अपने उसूलों को महत्व दिया—यही वजह है कि वे हिंदुत्व की राजनीति में एक अलग पहचान बन सके। उनकी बर्थ एनिवर्सरी पर आइए, उनके जीवन की कुछ कम जानी-पहचानी झलकियों पर नज़र डालते हैं।

साधारण परिवार से सार्वजनिक जीवन तक

अलीगढ़ जिले के मढ़ौली गांव में जन्मे कल्याण सिंह के पिता तेजपाल सिंह लोधी और माता सीता देवी थीं। राजनीति में आने से पहले उन्होंने अध्यापन को अपना पेशा बनाया। यह अनुभव आगे चलकर शिक्षा और प्रशासन से जुड़े उनके फैसलों में साफ दिखाई दिया।

संघ से राजनीति तक का सफर

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ाव ने उन्हें समाजसेवा की दिशा दी। यहीं से उनकी राजनीतिक यात्रा ने रफ्तार पकड़ी। जनसंघ के मंच से सक्रिय राजनीति में कदम रखने के बाद 1967 में वे अतरौली से विधायक बने। 2002 तक वे दस बार विधानसभा सदस्य रहे—यह उनकी जमीनी पकड़ का प्रमाण है।
आपातकाल के दौरान 20 महीने की जेल ने उनके राजनीतिक तेवर और दृढ़ कर दिए। 1977 में जनता पार्टी की सरकार में स्वास्थ्य मंत्री बनने के साथ उनकी प्रशासनिक समझ और निखरी।

संगठनकर्ता से मुख्यमंत्री तक

भाजपा के गठन के बाद वे प्रदेश संगठन महामंत्री और फिर प्रदेशाध्यक्ष बने। गांव-गांव घूमकर संगठन को मजबूत करना उनकी पहचान रही। 1991 में भाजपा की सरकार बनी तो कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने—और यहीं से उनके फैसलों की चर्चा देशभर में होने लगी।

कड़े फैसले, साफ नीयत

मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने नकल जैसे संगठित अपराध पर सख्ती दिखाई। अतरौली जैसे क्षेत्रों में नकल रोकने के लिए अध्यादेश लाकर एक मिसाल कायम की। कानून-व्यवस्था पर उनका रुख स्पष्ट था—अपराधियों के लिए सख्ती, ईमानदारों के लिए सुरक्षा। गलत की पैरवी उन्होंने कभी नहीं की।

‘हिंदू हृदय सम्राट’ की पहचान

राम मंदिर आंदोलन में उनकी भूमिका ने उन्हें “हिंदू हृदय सम्राट” का संबोधन दिलाया। सत्ता बनी रहे—इससे अधिक उनके लिए सिद्धांत महत्वपूर्ण थे। यही वजह रही कि वे समर्थकों के बीच भरोसे और विरोधियों के बीच सम्मान के पात्र बने।

अंतिम अध्याय

21 अगस्त 2021 को लखनऊ में 89 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ। लेकिन सिद्धांतों, निर्णयों और जनसेवा की जो विरासत वे छोड़ गए, वह आज भी भारतीय राजनीति में एक कसौटी की तरह देखी जाती है।

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