शनिवार की अकड़, सोमवार की बेबसी: हाईवे कांड के दोषियों को उम्रकैद
कोर्ट के फैसले ने बदले जुबैर–साजिद के तेवर, उम्रकैद से मची खलबली

दो दिन पहले तक जिन चेहरों पर न पछतावे की लकीर थी, न कानून का डर—सोमवार को अदालत का फैसला आते ही वही चेहरे बुझ से गए। हाईवे कांड में दोषी करार दिए गए जुबैर और साजिद की अकड़ उस वक्त पूरी तरह ढह गई, जब अदालत ने उन्हें जीवन की अंतिम सांस तक जेल में रहने की सजा सुना दी। कोर्ट परिसर में माहौल अचानक बदल गया। फैसले के बाद जब दोनों को जेल वैन से कोर्ट रूम और फिर बाहर ले जाया गया, तो वे खुद को निर्दोष बताते हुए लगातार चिल्लाते रहे। उनका कहना था कि उन्हें साजिश के तहत फंसाया गया है। इसके उलट, उनके साथ मौजूद अन्य तीन दोषी—धर्मवीर, नरेश और सुनील—पूरे समय चुप्पी साधे रहे। यही खामोशी लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गई।
शनिवार का ‘स्टाइल’, सोमवार को बिखरा
शनिवार को जब अदालत ने सभी पांचों को दोषी ठहराया था, तब जुबैर और साजिद का रवैया बिल्कुल अलग था। पुलिस अभिरक्षा में भी वे मीडिया कैमरों की ओर देखते हुए बेधड़क कहते नजर आए थे—“हमें फेमस कर दो।” लेकिन सोमवार को सजा सुनते ही उनकी देह-भाषा बदल चुकी थी। जो आरोपी दो दिन पहले सुर्खियों में बने रहने को उतावले थे, वही अब सजा के डर से बौखलाए और गिड़गिड़ाते दिखाई दिए।

डीएनए टेस्ट का सवाल, बेगुनाही का दावा
सजा से पहले जब पुलिस उन्हें कोर्ट परिसर में ले जा रही थी, तब जुबैर और साजिद अचानक ऊंची आवाज में बोलने लगे। उन्होंने मीडिया और मौजूद लोगों से कहा कि वे निर्दोष हैं और पुलिस ने उन्हें झूठे मामले में फंसा दिया है।
दोनों बार-बार यह सवाल उठाते रहे कि यदि वे दोषी थे, तो उनका डीएनए टेस्ट क्यों नहीं कराया गया। विज्ञान और जांच प्रक्रिया का हवाला देकर वे सहानुभूति बटोरने की कोशिश करते रहे। साजिद ने यहां तक दावा किया कि इस मुकदमे के कारण उसके एक भाई की मौत हो चुकी है। उन्होंने हाईकोर्ट में अपील करने की बात भी कही। हालांकि, कानून के जानकारों का कहना है कि सजा भावनाओं पर नहीं, बल्कि ठोस साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर तय होती है—और इस मामले में अदालत पहले ही सभी पहलुओं की गहन जांच कर चुकी है।
127 पन्नों का फैसला, समाज को सख्त संदेश
बहुचर्चित हाईवे कांड में अदालत का 127 पन्नों का फैसला सिर्फ सजा भर नहीं, बल्कि एक सख्त संदेश भी है। न्यायालय ने अपने आदेश में अपराध की बर्बरता, पीड़ितों की पीड़ा और समाज में फैलने वाले भय को स्पष्ट शब्दों में रेखांकित किया। फैसले में चश्मदीद गवाहों के बयान, फॉरेंसिक रिपोर्ट और घटनाक्रम की हर कड़ी का विस्तार से विश्लेषण किया गया। अदालत ने कहा कि सड़क पर सफर कर रहे आम नागरिकों की सुरक्षा सर्वोपरि है और ऐसे जघन्य अपराधों में किसी भी तरह की नरमी समाज के लिए घातक होगी।

क्या था पूरा मामला
यह वारदात 28 जुलाई 2016 की रात बुलंदशहर में नेशनल हाईवे-91 पर हुई थी। गाजियाबाद निवासी एक परिवार शाहजहांपुर में तेरहवीं कार्यक्रम में शामिल होने जा रहा था। दोस्तपुर फ्लाईओवर के पास बदमाशों ने उनकी कार रोककर सभी छह लोगों को बंधक बना लिया। तीनों पुरुषों के हाथ-पैर बांध दिए गए, जबकि 14 वर्षीय किशोरी और उसकी मां के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया। इसके बाद आरोपी लूटपाट कर फरार हो गए।
हाईकोर्ट के आदेश पर सीबीआई ने जांच की। एक आरोपी की सुनवाई के दौरान मौत हो गई, जबकि शेष पांच—जुबैर, साजिद, धर्मवीर, नरेश और सुनील—को शनिवार को दोषी और सोमवार को उम्रकैद की सजा सुनाई गई। प्रत्येक पर 1.81 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया, जिसमें से आधी राशि पीड़ित मां-बेटी को दी जाएगी।
अंतिम सांस तक जेल
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सभी दोषी अब जीवन की अंतिम सांस तक जेल में रहेंगे। करीब नौ साल बाद आए इस फैसले ने न सिर्फ पीड़ित परिवार को न्याय दिलाया, बल्कि यह भी जता दिया कि कानून को चुनौती देने वालों के लिए अंततः कोई बचाव नहीं होता।


