भारत-पाकिस्तान युद्ध 1971 में मिली ऐतिहासिक विजय की स्मृति में देशभर में 54वां विजय दिवस पूरे सम्मान और गर्व के साथ मनाया गया। इस अवसर पर मंगलवार को नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर विशेष पुष्पांजलि समारोह आयोजित हुआ, जहां देश के शीर्ष सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व ने वीर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की। इस समारोह में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान, थल सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी, वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह और नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश कुमार त्रिपाठी उपस्थित रहे। सभी ने 1971 के युद्ध में बलिदान देने वाले सैनिकों के साहस और शौर्य को नमन किया।
देशभर में श्रद्धांजलि कार्यक्रम
दिल्ली के साथ-साथ तेलंगाना के सिकंदराबाद में भी विजय दिवस को भावपूर्ण ढंग से मनाया गया। एसपी रोड स्थित आर्मी परेड ग्राउंड में बने वीरूला सैनिक स्मारक पर पुष्पांजलि कार्यक्रम हुआ। यहां आयोजित समारोह में तेलंगाना के राज्यपाल जिष्णु देव वर्मा मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए।
1971 का युद्ध और बांग्लादेश का जन्म
भारतीय सेना की पूर्वी कमान के अनुसार, 1971 का युद्ध 16 दिसंबर को उस समय समाप्त हुआ जब पाकिस्तानी सेना की पूर्वी कमान के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल ए.ए.के. नियाज़ी ने भारतीय सेना के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के समक्ष आत्मसमर्पण किया। इसी ऐतिहासिक घटना के साथ एक नए राष्ट्र — बांग्लादेश — का उदय हुआ।आत्मसमर्पण के तहत पाकिस्तान की थल, वायु और नौसेना के साथ-साथ अर्धसैनिक बलों ने हथियार डाल दिए। यह भी स्पष्ट किया गया कि आत्मसमर्पण के बाद सभी बल भारतीय कमान के आदेशों के अधीन रहेंगे और नियमों के उल्लंघन पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। साथ ही, आत्मसमर्पण करने वाले सैनिकों के साथ जिनेवा कन्वेंशन के अनुसार सम्मानजनक व्यवहार का आश्वासन दिया गया।
प्रधानमंत्री मोदी ने किया वीरों को नमन
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी विजय दिवस पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर संदेश साझा करते हुए 1971 के युद्ध में भाग लेने वाले सैनिकों को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने लिखा कि भारतीय सैनिकों के अदम्य साहस, बलिदान और राष्ट्रभक्ति ने देश को ऐतिहासिक विजय दिलाई और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने रहेंगे।
गौरव और बलिदान का प्रतीक विजय दिवस
तब से लेकर आज तक, हर साल 16 दिसंबर को विजय दिवस मनाया जाता है। यह दिन न केवल भारत की सैन्य क्षमता और रणनीतिक कौशल का प्रतीक है, बल्कि उन वीर जवानों की अमर गाथा भी है, जिनके बलिदान से बांग्लादेश को स्वतंत्रता और दक्षिण एशिया को एक नया इतिहास मिला।


