हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले का रिखी, जो 1980 में एक सड़क दुर्घटना के बाद अपनी पहचान और परिवार—दोनों खो बैठा था, आखिरकार 45 साल बाद अपने घर लौट आया। अब वे हरियाणा और महाराष्ट्र में रवि चौधरी के नाम से जाने जाते हैं। बीते हफ्ते जब वह अपनी पत्नी और बच्चों के साथ नाहन के पास स्थित अपने पैतृक गांव नाड़ी पहुंचे, तो गांव में भावनाओं का सैलाब उमड़ पड़ा। परिजनों ने जिन्हें वर्षों पहले मृत मान लिया था, उन्हें सामने खड़ा देख फफक कर रो पड़े।

भावुक पल, जब गले मिले भाई-बहन
गांव वालों ने रिखी का फूल-मालाओं और संगीत के साथ स्वागत किया। चार दशक बाद उन्होंने अपने भाई-बहनों—दुर्गा राम, चंदर मोहन, चंद्रमणि, कौशल्या देवी, कला देवी और सुमित्रा देवी—से मुलाकात की। सभी की आंखें खुशी के आंसुओं से नम थीं।
कैसे खोई थी याददाश्त?
1980 में रिखी हरियाणा के यमुनानगर में एक होटल में नौकरी करते थे। अंबाला जाते समय हुए बड़े सड़क हादसे ने उनकी स्मृति छीन ली। पहचान मिटते ही वे घर से दूर भटकते रहे। इस बीच दोस्तों ने उनका नाम रवि चौधरी रख दिया।
बीते वर्षों में वे मुंबई पहुंचे, छोटे-मोटे काम किए, फिर महाराष्ट्र के नांदेड में एक कॉलेज में नौकरी मिली। वहीं उनकी मुलाकात संतोषी से हुई, जिससे उन्होंने विवाह किया। अब उनके तीन बच्चे हैं।
दूसरी चोट—और लौटी गायब हुई जिंदगी
कुछ महीने पहले सिर पर दोबारा चोट लगने के बाद उन्हें बार-बार ऐसे सपने आने लगे—गांव की तंग गलियां, आम का पेड़ और सताऊं नाम की जगह पर एक पुराने घर का आंगन। धीरे-धीरे उन्हें समझ आया कि ये सपने नहीं, बीते जीवन की झलकियां हैं।
इंटरनेट बना कड़ी
एक कॉलेज छात्र की मदद से उन्होंने सताऊं क्षेत्र को गूगल पर खोजा। एक फोन नंबर मिला, जिसके जरिए उन्होंने रुद्र प्रकाश से संपर्क किया। खबर फैलते ही रिश्तेदार एम. के. चौबे ने पुराने संदर्भों से उनकी पहचान को जोड़ कर देखा और इस तरह रिखी का अपने परिवार से संपर्क बन पाया।
डॉक्टरों की राय
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. आदित्य शर्मा बताते हैं कि ऐसे मामले बेहद कम देखने को मिलते हैं। वे कहते हैं कि इसकी सही वजह का पता विस्तृत न्यूरोलॉजिकल जांच के बाद ही लग सकेगा।


