दुनियाभर के बाजारों में साल के आखिरी दिनों में बढ़ती अनिश्चितता ने निवेशकों को जोखिम से दूर कर दिया है। इसका सीधा फायदा कीमती धातुओं को मिला है, जहां सोना, चांदी और प्लैटिनम ऐतिहासिक ऊंचाइयों पर पहुंच गए हैं। वैश्विक तनाव, कमजोर डॉलर और कम ब्याज दरों के माहौल में निवेशकों ने एक बार फिर ‘सेफ हेवन’ की राह पकड़ ली है। शुक्रवार को हाजिर सोने की कीमत 1.2 फीसदी की छलांग लगाते हुए 4,530 डॉलर प्रति औंस के पार निकल गई। चांदी ने भी अपनी तेजी बरकरार रखते हुए लगातार पांचवें सत्र में बढ़त दर्ज की और 75 डॉलर प्रति औंस का आंकड़ा पार कर लिया। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि डॉलर में आई कमजोरी और भू-राजनीतिक हालात ने इस उछाल को और मजबूती दी है।
अमेरिका की ओर से कुछ इलाकों में सैन्य गतिविधियां और वेनेजुएला जैसे देशों पर बढ़ता दबाव निवेशकों की चिंता बढ़ा रहा है। ऐसे माहौल में सोना और चांदी फिर से भरोसेमंद विकल्प के रूप में उभरे हैं। वहीं साल के अंत में बाजार में कम लिक्विडिटी के कारण कीमतों में उतार-चढ़ाव भी ज्यादा देखने को मिल रहा है। Sky Link Capital Group के सीईओ Daniel Takieddine के मुताबिक, वैश्विक अस्थिरता और डॉलर की कमजोरी ने सुरक्षित निवेश की मांग को नई ऊंचाई दी है। गौर करने वाली बात यह है कि डॉलर इंडेक्स इस सप्ताह करीब 0.7 फीसदी टूट चुका है, जो जून के बाद की सबसे बड़ी साप्ताहिक गिरावट है।
आंकड़े बताते हैं कि 2025 में अब तक सोने की कीमत करीब 70 फीसदी और चांदी 150 फीसदी से ज्यादा उछल चुकी है। यह तेजी 1979 के बाद सबसे मजबूत मानी जा रही है। इसके पीछे केंद्रीय बैंकों की आक्रामक खरीद, ईटीएफ में बढ़ता निवेश और अमेरिकी फेड द्वारा लगातार ब्याज दरों में कटौती जैसे बड़े कारण हैं। कम ब्याज दरों का फायदा आमतौर पर उन परिसंपत्तियों को मिलता है जिन पर ब्याज नहीं मिलता, जैसे सोना और चांदी। बढ़ते सरकारी कर्ज और मुद्रा के अवमूल्यन की आशंका ने भी निवेशकों को बॉन्ड से हटाकर कीमती धातुओं की ओर मोड़ा है।
चांदी की तेजी खास तौर पर चौंकाने वाली रही है। अक्टूबर में आए शॉर्ट स्क्वीज के बाद से सप्लाई पर दबाव बना हुआ है। लंदन के वॉल्ट्स में स्टॉक बढ़ा जरूर है, लेकिन अमेरिका में भौतिक चांदी की उपलब्धता सीमित बनी हुई है, जिससे कागजी सौदों को कवर करना मुश्किल होता जा रहा है। प्लैटिनम भी इस रैली में पीछे नहीं रहा। सिर्फ इसी महीने में इसकी कीमत 40 फीसदी से ज्यादा बढ़ी है और यह 1987 के बाद पहली बार 2,400 डॉलर प्रति औंस के ऊपर पहुंच गया। ऑटोमोबाइल और ज्वेलरी सेक्टर से बढ़ती मांग और दक्षिण अफ्रीका में उत्पादन में रुकावट ने इसकी आपूर्ति को प्रभावित किया है। विश्लेषकों का मानना है कि जब तक वैश्विक तनाव, डॉलर पर दबाव और आर्थिक अनिश्चितता बनी रहती है, तब तक कीमती धातुओं में मजबूती का सिलसिला जारी रह सकता है।


