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सनातन सत्ता का नहीं, संस्कार का विषय है: शंकराचार्य स्वामी राजराजेश्वराश्रम महाराज

आगरा। सनातन का न कोई आरंभ है और न अंत। जो सृष्टि के साथ उत्पन्न हुआ, वही सनातन है—न उसे नया कहा जा सकता है, न पुराना। समय के साथ अनेक युग बदले, कई विदेशी शक्तियाँ आईं और चली गईं, लेकिन सनातन की मूल आत्मा को कोई क्षति नहीं पहुँचा सका। इसलिए सनातन को राजनीतिक सत्ता की नहीं, संस्कारों की आवश्यकता है। सत्ता स्वयं सनातन मूल्यों के आगे नतमस्तक होती है। यह विचार शारदा पीठाधीश्वर अनंत श्री विभूषित जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी राजराजेश्वराश्रम महाराज ने व्यक्त किए।

बुधवार को जयपुर हाउस में आयोजित कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि कुछ राजनेता और लोग यह कहते हैं कि भारत को सनातन राष्ट्र या हिंदू राष्ट्र बनाया जाना चाहिए, जबकि यह शब्दावली ही त्रुटिपूर्ण है। जो पहले से अस्तित्व में है, उसे बनाया नहीं जाता। भारत पहले से ही सनातन और हिंदू राष्ट्र है। समस्या यह है कि सत्ता की लालसा में कुछ सनातन धर्मावलंबी अपनी मूल पहचान से दूर होते जा रहे हैं। उन्होंने राजनीति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि सत्ता में कई तरह की विकृतियाँ आ जाती हैं। वोट बैंक की राजनीति के चलते तुष्टीकरण बढ़ता है और सिद्धांत पीछे छूट जाते हैं। भारत कृषि प्रधान देश है, लेकिन आज ऐसा प्रतीत होता है कि देश ‘कुर्सी प्रधान’ बनता जा रहा है। मौजूदा माहौल में ऐसा लगता है कि अल्पसंख्यकों से अधिक बहुसंख्यकों को सत्ता की आवश्यकता पड़ रही है।

शंकराचार्य ने यह भी कहा कि वास्तविक अर्थों में कोई अल्पसंख्यक नहीं है, लेकिन जो स्वयं को ऐसा मानते हैं, वे अपनी परंपराओं और पंथ के विस्तार के लिए निरंतर सक्रिय हैं। इसके विपरीत हिंदू समाज न तो पूरी तरह एकजुट है और न ही जागरूक। उसे संगठन और चेतना—दोनों की आवश्यकता है। उन्होंने नेताओं पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि आज राजनीति में जनता और राष्ट्र के प्रति प्रेम कम होता जा रहा है। अधिकांश नेता निजी स्वार्थ साधने में लगे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जनता की भावनाओं के अनुरूप संविधान में परिवर्तन संभव है, क्योंकि जनप्रतिनिधियों को चुना ही इसी उद्देश्य से जाता है कि वे राष्ट्रहित में आवश्यक व्यवस्थाएँ सुनिश्चित करें।

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