बुधवार को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले तेज गिरावट के साथ अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। दिन के कारोबार के अंत में रुपया 76 पैसे टूटकर 91.73 (अस्थायी) पर बंद हुआ। वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितता, निवेशकों की जोखिम से दूरी और विदेशी संस्थागत निवेशकों की लगातार बिकवाली ने घरेलू मुद्रा पर दबाव बनाए रखा। फॉरेक्स बाजार से जुड़े जानकारों के मुताबिक, इससे पहले रुपये ने 16 दिसंबर 2025 को 91.14 का रिकॉर्ड निचला स्तर छुआ था। मौजूदा महीने में अब तक रुपये में करीब 1.50 फीसदी की कमजोरी आ चुकी है, जिसकी बड़ी वजह वैश्विक भू-राजनीतिक हालात बताए जा रहे हैं।
यूरोप में तनाव और घरेलू बाजार की कमजोरी का असर
विश्लेषकों का कहना है कि ग्रीनलैंड से जुड़े विवाद और संभावित टैरिफ को लेकर यूरोप में बढ़ते तनाव ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। इसके साथ ही घरेलू शेयर बाजारों के कमजोर रुख ने भी धारणा को और नकारात्मक बनाया। इंटरबैंक फॉरेन एक्सचेंज बाजार में रुपया 91.05 पर खुला था, लेकिन कारोबार के दौरान फिसलकर 91.74 के दिन के निचले स्तर तक पहुंच गया। आखिरकार यह 91.73 पर बंद हुआ। इससे पहले मंगलवार को भी रुपये में 7 पैसे की गिरावट दर्ज की गई थी।
उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर अस्थिर पूंजी प्रवाह का दबाव
कोटक महिंद्रा एएमसी के हेड–फिक्स्ड इनकम अभिषेक बिसेन के अनुसार, भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाएं इस समय अस्थिर पूंजी प्रवाह की चुनौती झेल रही हैं। उन्होंने बताया कि ग्रीनलैंड विवाद से अमेरिका–यूरोप संबंधों में आई खटास, नाटो की मजबूती पर सवाल और वेनेजुएला के तेल भंडार को लेकर अमेरिका की भूमिका जैसे घटनाक्रम वैश्विक व्यापार माहौल को प्रभावित कर रहे हैं। उनके मुताबिक, भारत और अमेरिका के बीच लंबित व्यापार समझौता यदि पूरा होता है तो यह निवेशकों के भरोसे के लिए एक अहम सहारा बन सकता है।
आगे भी संवेदनशील रह सकता है रुपया
बिसेन का मानना है कि जब तक भू-राजनीतिक जोखिम कम नहीं होते और व्यापार समझौते पर प्रगति नहीं होती, तब तक रुपया बाहरी झटकों के प्रति संवेदनशील बना रह सकता है। हालांकि, मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार के कारण भारतीय रिजर्व बैंक के पास स्थिति को संभालने के पर्याप्त साधन मौजूद हैं। साथ ही, रुपये की कमजोरी ने इसे वास्तविक प्रभावी विनिमय दर (REER) के आधार पर अपेक्षाकृत सस्ता बना दिया है, जिससे निर्यात को कुछ समर्थन मिल सकता है।


