कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) को समाप्त किए जाने के प्रयासों के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन छेड़ने का आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि ग्रामीण गरीबों के जीवन से जुड़े इस कानून को खत्म करना करोड़ों लोगों के रोजगार और सम्मान पर सीधा हमला है। खरगे ने याद दिलाया कि यह कानून यूपीए सरकार की ऐतिहासिक उपलब्धियों में से एक रहा है, जिसने गांवों में रोजगार की गारंटी दी। कांग्रेस कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) की बैठक को संबोधित करते हुए खरगे ने कहा कि जिस तरह किसानों के व्यापक विरोध के बाद सरकार को कृषि कानून वापस लेने पड़े थे, उसी तरह मनरेगा के मुद्दे पर भी जनता की आवाज़ को दबाया नहीं जा सकता। उन्होंने इसे गरीब विरोधी मानसिकता का उदाहरण बताया।
बैठक में खरगे ने बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों की कड़ी निंदा की और कहा कि इस स्थिति ने पूरे देश को चिंतित किया है। साथ ही उन्होंने कांग्रेस नेताओं से आगामी विधानसभा चुनावों के लिए पूरी ताकत से जुटने का आह्वान किया। उन्होंने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लोकतांत्रिक अधिकारों को सीमित करने की सुनियोजित कोशिश बताते हुए चेताया कि पार्टी को यह सुनिश्चित करना होगा कि कांग्रेस समर्थक मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से न हटें।
कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि देश इस समय ऐसे दौर से गुजर रहा है, जब लोकतंत्र, संविधान और नागरिक अधिकारों पर चारों ओर से खतरे मंडरा रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि संसद के हालिया शीतकालीन सत्र में केंद्र सरकार ने मनरेगा को कमजोर कर गरीब और वंचित तबके को बेसहारा छोड़ दिया। खरगे के शब्दों में, यह कदम गरीबों के पेट पर लात मारने और उनकी पीठ में छुरा घोंपने जैसा है। खरगे ने सरकार पर आरोप लगाया कि उसे आम लोगों की भलाई से अधिक चिंता बड़े पूंजीपतियों के मुनाफे की है। उन्होंने कहा कि मनरेगा एक दूरदर्शी योजना थी, जिसकी सराहना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुई और जिसने ग्रामीण भारत की तस्वीर बदल दी। इस योजना से न सिर्फ पलायन रुका, बल्कि गांवों को भूख, अकाल और शोषण से भी राहत मिली।
उन्होंने दावा किया कि मनरेगा ने दलितों, आदिवासियों, महिलाओं और भूमिहीन मजदूरों को सुरक्षा का एहसास दिया और यह भरोसा दिलाया कि सरकार गरीबी के खिलाफ लड़ाई में उनके साथ है। खरगे ने आरोप लगाया कि बिना किसी अध्ययन, मूल्यांकन या राज्यों और राजनीतिक दलों से चर्चा किए सरकार ने इसे समाप्त कर नया कानून थोप दिया, ठीक उसी तरह जैसे पहले कृषि कानून लाए गए थे।


