जब एक ओर महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ संघर्ष की नींव रख रहे थे, उसी दौरान भारत की धरती पर एक और महान क्रांतिकारी जनजातीय समाज को जागृत कर रहा था— बिरसा मुंडा। 15 नवंबर को जन्मे बिरसा मुंडा न सिर्फ झारखंड के हीरो हैं, बल्कि पूरी दुनिया में धरती आबा के नाम से सम्मानित किए जाते हैं। कम उम्र में ही उन्होंने जनजातीय समाज के अधिकारों और पहचान के लिए ऐसा आंदोलन खड़ा किया, जिसने इतिहास की दिशा ही बदल दी।

जन्म और शिक्षा
15 नवंबर 1875 को झारखंड के खूंटी जिले के उलीहातू गांव में जन्मे बिरसा मुंडा के पिता का नाम करमी मुंडा और मां का नाम सुगना मुंडा था। शुरुआती पढ़ाई सलमा में करने के बाद वे मिशन स्कूल गए।
साल 1890 में वह चाईबासा से लौटे और कुछ ही समय बाद, 1895 में उन्होंने मुंडा समुदाय को एकजुट कर अपने प्रसिद्ध आंदोलन उलगुलान की शुरुआत की। उनकी बढ़ती लोकप्रियता और प्रभाव से अंग्रेजी सरकार चिंतित रहने लगी।
अंग्रेजों के लिए चुनौती बन गए बिरसा मुंडा
कम समय में ही बिरसा मुंडा जनजातीय समाज के सबसे बड़े नेता के रूप में उभरे। अंग्रेज उनकी लोकप्रियता से घबरा गए और उनके सिर पर 500 रुपये का इनाम घोषित कर दिया।
उन्होंने कहा कि मिशनरियों द्वारा प्रचारित ईसाई धर्म जनजातीय संस्कृति को कमजोर कर रहा है। इसी के विरोध में उन्होंने बिरसाइत धर्म की स्थापना की—एक ऐसा विश्वास जो जनजातीय पहचान और परंपराओं को पुनर्जीवित करने का काम करता था।
डोंबारी बुरू: अंतिम संघर्ष का मैदान
खूंटी जिले की डोंबारी बुरू पहाड़ी बिरसा मुंडा के संघर्ष की ऐतिहासिक गवाह है। यही वह स्थल है जहां उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ अंतिम लड़ाई लड़ी।
सइल रकब पहाड़ी पर 9 जनवरी 1900 को अंग्रेजी पुलिस ने बिरसा मुंडा के समर्थकों पर बर्बर तरीके से गोलियां बरसाईं। इस घटना की स्मृति में आज वहां 110 फीट ऊंचा स्मारक स्तंभ खड़ा है, जो शहीदों की वीरता का प्रतीक है।
गिरफ्तारी और निधन
अंग्रेजों ने 1895 में पहली बार और 1900 में दूसरी बार बिरसा मुंडा को गिरफ्तार किया।
कुछ ही महीनों बाद 9 जून 1900 को रांची जेल में रहस्यमय परिस्थितियों में उनका निधन हो गया। केवल 25 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपने संघर्ष से वह इतिहास रचा जिसे आज भी जनजातीय गौरव का आधार माना जाता है।


