अमेरिकी अर्थव्यवस्था इस समय ऐसे संवेदनशील मोड़ पर है जहाँ नीतियों की मामूली फेरबदल भी वैश्विक बाज़ारों को हिला सकता है। इसी बीच फेडरल रिज़र्व ने लगातार तीसरी बार ब्याज दरों में कटौती कर निवेशकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। दिलचस्प बात यह है कि फेड ने राहत देते हुए भी स्पष्ट संकेत दे दिया है कि आगे दरों में बड़े पैमाने पर ढील की संभावना काफी सीमित है। यानी नीतिगत नरमी भी और सतर्क कदम भी—जिससे बाज़ार सहभागी उलझन में हैं।
फेडरल रिज़र्व ने क्या संकेत दिया?
फेड की मौद्रिक नीति समिति (FOMC) ने बेंचमार्क ओवरनाइट रेट में 25 बेसिस प्वाइंट की कटौती करते हुए इसे 3.5–3.75% के दायरे में ला दिया। निर्णय भले ही अपेक्षा के अनुरूप रहा, किंतु बयानबाज़ी में फेड का रुख सख्त दिखा। इस बार मतदान में असामान्य विभाजन देखने को मिला—9 में से 3 सदस्य फैसले से असहमत थे।
- एक सदस्य 0.50% की बड़ी कटौती के पक्ष में थे,
- जबकि दो सदस्यों ने किसी भी तरह की कटौती को अनावश्यक बताया।
- यह मतभेद बताता है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था की दिशा को लेकर फेड के भीतर भी गहरी असहमति पनप चुकी है।
महंगाई अब भी फेड के रडार पर
FOMC ने दोहराया कि आगे की नीतिगत चालें पूरी तरह डेटा पर आधारित होंगी। भले ही GDP अनुमान बढ़ाकर 2.3% कर दिया गया है, लेकिन महंगाई 2% के लक्ष्य से काफी दूर है। सितंबर में 2.8% की रफ्तार के बाद भी फेड का आकलन है कि मुद्रास्फीति 2028 तक लक्ष्य के करीब नहीं आएगी। यानी कीमतों पर दबाव अभी भी चिंता की सबसे बड़ी वजह बना हुआ है।
फेड की बैलेंस शीट पर नया कदम
दर में कटौती के साथ ही फेड ने अपने बैलेंस शीट संचालन में भी बदलाव किया है।
शुक्रवार से वह 40 अरब डॉलर के ट्रेज़री बिल खरीदने की शुरुआत करेगा।
यह कदम फंडिंग मार्केट में संभावित तनाव को कम करने और अल्पकालिक तरलता बढ़ाने के उद्देश्य से उठाया गया है।
पॉवेल के कार्यकाल और राजनीति की गर्माहट
यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब चेयर जेरोम पॉवेल के कार्यकाल में केवल तीन बैठकें बाकी हैं। राष्ट्रपति ट्रंप की ओर से पहले ही संकेत मिल चुके हैं कि वे अधिक ढीली मौद्रिक नीति वाले चेयर की नियुक्ति को प्राथमिकता देंगे। बाज़ारों में चर्चा है कि केविन हैसेट इस दौड़ में सबसे आगे चल रहे हैं।
भारत के लिए इसका क्या मतलब?
फेड का कड़ा रुख भारत सहित उभरते बाज़ारों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
- विदेशी निवेश (FII) का रुख
- रुपये में उतार–चढ़ाव
- और RBI की आगामी नीतियाँ
—इन सब पर अमेरिकी नीति का सीधा प्रभाव पड़ सकता है। भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था भले ही बेहतर दिख रही हो, लेकिन वैश्विक सख्ती भारतीय बाज़ारों में अस्थिरता बढ़ा सकती है।


