जेआरडी टाटा: एक नाम, जिसने सपनों को हकीकत में बदला
भारतीय उद्योग जगत में कुछ नाम ऐसे हैं जिन्होंने सिर्फ कारोबार नहीं खड़ा किया, बल्कि देश की तरक्की की नींव रखी। उन्हीं में एक थे जेआरडी टाटा — एक दूरदर्शी नेता, एक साहसी पायलट और रोजगार पैदा करने वाला एक महान उद्योगपति। 29 नवंबर उनकी पुण्यतिथि के मौके पर आइए, उनके जीवन से जुड़ी कुछ अनसुनी और दिलचस्प बातों पर नजर डालते हैं।

राजनीति का सपना, सेवा का जुनून
बहुत कम लोग जानते हैं कि जेआरडी टाटा कभी राजनीति में कदम रखने के बारे में भी सोचते थे। जवाहरलाल नेहरू से वे बेहद प्रभावित थे। लेकिन गहन आत्ममंथन के बाद उन्हें समझ आया कि मंच से भाषण देने से ज़्यादा प्रभावी काम वे उद्योग जगत के ज़रिए कर सकते हैं। तभी उन्होंने यह फैसला किया कि वे देश की सेवा उद्यमिता और रोज़गार निर्माण के ज़रिए करेंगे — और यही फैसला भारत के भविष्य के लिए निर्णायक साबित हुआ।
फ्रांस से भारत तक का सफर
1925 में पिता की इच्छा पर जेआरडी टाटा फ्रांस छोड़कर भारत लौटे। शुरुआत में उन्होंने टाटा स्टील (टISCO) में बतौर प्रशिक्षु काम किया। पिता के निधन के बाद महज 22 साल की उम्र में वे टाटा संस के बोर्ड में जगह बना चुके थे। उस वक्त तक वे फ्रांस के नागरिक थे, लेकिन 1929 में उन्होंने विदेशी नागरिकता त्यागकर भारत को अपनी कर्मभूमि के रूप में चुना।
आसमान जीतने वाले पहले भारतीय पायलट
जेआरडी टाटा सिर्फ ज़मीन पर उद्योग खड़ा करने वाले उद्योगपति नहीं थे, बल्कि वे भारत के पहले कमर्शियल पायलट भी बने। साल 1929 में उन्हें फ्लाइंग लाइसेंस मिला और 1932 में शुरू हुई टाटा एविएशन सर्विस ने आगे चलकर एयर इंडिया का रूप लिया।
एयर इंडिया को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है। हालांकि 1953 में इसका राष्ट्रीयकरण हुआ, जिसका उन्होंने खुलकर विरोध किया। राजनीतिक उठापटक में 1977 में उन्हें एयर इंडिया के चेयरमैन पद से हटाया गया, लेकिन इंदिरा गांधी सरकार लौटने पर वे फिर इस पद पर बहाल हुए।
पांच दशकों तक टाटा की बागडोर
1938 में महज 34 साल की उम्र में उन्होंने टाटा समूह के चेयरमैन का पद संभाला और फिर लगातार 50 वर्षों तक इस साम्राज्य का नेतृत्व किया। उनकी अगुवाई में टाटा समूह ने स्टील, ऑटोमोबाइल, बिजली, होटल, केमिकल्स और आईटी जैसे कई क्षेत्रों में कदम रखा। वे टाटा समूह के सबसे लंबे समय तक सेवाएं देने वाले चेयरमैन बने।
एक युग का अंत
29 नवंबर 1993 को जेआरडी टाटा का निधन हुआ, लेकिन उनके विचार, मूल्य और देश निर्माण का सपना आज भी हर टाटा कंपनी में जीवित है। वे एक उद्योगपति से कहीं बढ़कर थे — वे भारत के आधुनिक औद्योगिक युग के शिल्पकार थे।


