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ग्रेट निकोबार परियोजना पर जयराम रमेश का हमला, बोले– सरकार पर्यावरणीय आपदा को दे रही है न्योता

‘ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस’ बनाम प्रकृति: ग्रेट निकोबार परियोजना पर केंद्र सरकार को घेरा जयराम रमेश ने

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद जयराम रमेश ने शुक्रवार को केंद्र की मोदी सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि ग्रेट निकोबार द्वीप समूह में प्रस्तावित बड़े विकास कार्य एक बड़ी पर्यावरणीय तबाही को न्योता दे रहे हैं। उनका कहना है कि यह इलाका अत्यंत संवेदनशील पारिस्थितिकी वाला क्षेत्र है, जहाँ आक्रामक बुनियादी ढांचे का निर्माण जलवायु जोखिम, स्वास्थ्य संकट और स्थानीय समुदायों के विस्थापन का कारण बन सकता है।

समाचार एजेंसी से बातचीत में रमेश ने सवाल उठाया कि सरकार ऐसे नाजुक क्षेत्रों में विशाल परियोजनाओं को किस तर्क के आधार पर मंजूरी दे रही है। उन्होंने कहा कि विकास के नाम पर पर्यावरणीय संतुलन और आम लोगों की भलाई की अनदेखी की जा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि जन स्वास्थ्य के लिहाज़ से देखें तो ये परियोजनाएँ प्राकृतिक आपदाओं की आशंका बढ़ाती हैं और जीवनदायिनी पारिस्थितिकी को कमजोर करती हैं। “इससे फायदा किसे हो रहा है? न आम जनता को, न ही स्थानीय आदिवासी समुदायों को,” उन्होंने कहा। रमेश ने आरोप लगाया कि सरकार पर्यावरण संरक्षण की जगह ‘ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस’ को प्राथमिकता दे रही है।

कांग्रेस नेता ने कहा कि प्रकृति के साथ छेड़छाड़ के परिणाम देश पहले ही सुनामी, बाढ़, भूकंप और भूस्खलन के रूप में देख चुका है। उनके अनुसार, जलवायु और पर्यावरण को लेकर प्रधानमंत्री के बयानों और ज़मीनी फैसलों में साफ विरोधाभास दिखाई देता है। रमेश ने यह भी याद दिलाया कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों की परिभाषा से जुड़े एक फैसले पर रोक लगाई थी, जिसे उन्होंने सरकार की नीतियों से उपजी संभावित पर्यावरणीय आपदा बताया। उन्होंने दावा किया कि ग्रेट निकोबार परियोजना भी उसी तरह की एक और बड़ी चुनौती बनकर उभर रही है।

अपने बयान में रमेश ने कहा कि वे पिछले एक साल से पर्यावरण मंत्री को पत्र लिख रहे हैं और संसद में लगातार इस मुद्दे को उठा रहे हैं। प्रस्तावित योजना के तहत द्वीप में हवाई अड्डा, बंदरगाह और पर्यटन से जुड़े ढांचे विकसित किए जाने हैं। उनका आरोप है कि इसके लिए लाखों पेड़ों की कटाई होगी, जैव विविधता को भारी क्षति पहुँचेगी और स्थानीय ग्राम सभाओं की असहमति के बावजूद आदिवासी समुदायों को विस्थापन का सामना करना पड़ेगा।

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