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इंस्टिंक्ट, साहस और सिनेमा: तीन दशकों का रानी मुखर्जी सफर

ट्रेंड नहीं, सच्चाई चुनी: रानी मुखर्जी के 30 साल का जश्न

रानी मुखर्जी: जहां स्टारडम से ज्यादा मायने रखती हैं कहानियां

तीन दशकों से हिंदी सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाए रखने वाली रानी मुखर्जी आज उस दौर में हैं जहाँ अनुभव, आत्मविश्वास और संवेदनशीलता एक साथ दिखाई देते हैं। साल 1997 में राजा की आएगी बारात से शुरू हुआ उनका सफर अब 30 साल पूरे कर चुका है—और खास बात यह है कि इस जश्न के साथ उनकी चर्चित फ्रेंचाइज़ी मर्दानी की तीसरी कड़ी भी जुड़ने जा रही है। इस मौके पर रानी मुखर्जी ने यश राज फिल्म्स के आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक भावुक और आत्ममंथन से भरा नोट साझा किया। उन्होंने साफ कहा कि उनका करियर किसी सोची-समझी रणनीति का नतीजा नहीं, बल्कि दिल की आवाज़ और सहज फैसलों की देन रहा है। उनके मुताबिक, उन्होंने कभी स्टार बनने का सपना नहीं देखा—बस कहानियों से प्यार किया और खुद को ईमानदारी से हर किरदार में झोंक दिया। रानी ने इस पूरे सफर को “अनरियल” बताया और लिखा कि वक्त कैसे बीत गया, इसका एहसास ही नहीं हुआ। उन्होंने याद किया कि कैसे वे अपनी पहली फिल्म के सेट पर एक घबराई हुई लड़की थीं और आज भी हर नए किरदार में वही जिज्ञासा और असुरक्षा अपने साथ रखती हैं। उनके लिए अभिनय मंज़िल नहीं, बल्कि लगातार सीखते रहने की प्रक्रिया है।

चुनौतीपूर्ण सिनेमा की ओर झुकाव

ब्लैक, हिचकी, नो वन किल्ड जेसिका और मिसेज चटर्जी वर्सेज नॉर्वे जैसी फिल्मों के ज़रिये रानी ने बार-बार यह साबित किया कि वे सुरक्षित रास्ते चुनने में यकीन नहीं रखतीं। उनका मानना है कि एक कलाकार का असली साहस बॉक्स ऑफिस के दबाव से ऊपर उठकर ऐसी कहानियाँ चुनने में होता है, जो समाज से संवाद कर सकें। अपने डेब्यू को याद करते हुए रानी ने कहा कि राजा की आएगी बारात ने उन्हें सिखाया कि सिनेमा सिर्फ ग्लैमर नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारी भी है। यही वजह रही कि वे आगे चलकर ऐसी महिला किरदारों की ओर खिंचती रहीं जो अन्याय के खिलाफ खड़ी होती हैं, व्यवस्था से सवाल पूछती हैं और चुप रहने से इनकार करती हैं। 2000 के दशक की शुरुआत को उन्होंने अपने करियर का अहम मोड़ बताया। साथिया और हम तुम ने उन्हें भावनात्मक रूप से जटिल और मानवीय किरदार निभाने का मौका दिया, जबकि ब्लैक को उन्होंने अपने जीवन के सबसे चुनौतीपूर्ण अनुभवों में से एक कहा। संजय लीला भंसाली और अमिताभ बच्चन के साथ काम करने से उन्हें अभिनय में खामोशी और संवेदना की ताकत समझ में आई।

‘मर्दानी’ और शांत ताकत

मर्दानी फ्रेंचाइज़ी के ज़रिये रानी ने महिला पुलिस अधिकारी शिवानी शिवाजी रॉय को जिस तरह पर्दे पर उतारा, वह पारंपरिक हीरोइज़्म से अलग था। रानी के मुताबिक, यह किरदार शोर-शराबे वाली बहादुरी नहीं, बल्कि “शांत लेकिन अडिग ताकत” का प्रतीक है—और यही बात उन्हें इस किरदार से गहराई से जोड़ती है। शादी और माँ बनने के बाद भी उनके करियर की दिशा नहीं बदली, बल्कि उनका चयन और स्पष्ट हो गया। उन्होंने कहा कि कम लेकिन अर्थपूर्ण काम करने से उन्हें उस विरासत की ओर बढ़ने में मदद मिली, जो वे छोड़ना चाहती हैं। हिचकी ने उन्हें संवेदनशीलता और प्रतिनिधित्व के मायने समझाए, जबकि मिसेज चटर्जी वर्सेज नॉर्वे ने यह एहसास पुख्ता किया कि सच्ची भावनाएँ भाषा और सीमाओं से परे होती हैं। इसी फिल्म के लिए मिला नेशनल अवॉर्ड उनके लिए खास तौर पर भावुक पल था।

आगे की राह

अपने 30 साल के करियर को समेटते हुए रानी ने लिखा कि लंबी पारी का मतलब ट्रेंड के पीछे भागना नहीं, बल्कि खुद के प्रति ईमानदार रहना है। उनके लिए असली उपलब्धियाँ अवॉर्ड्स या कमाई नहीं, बल्कि वे छोटे-छोटे पल हैं—कठिन सीन के बाद की खामोशी, बारिश में शूट किया गया कोई शॉट, या दर्शकों से मिला भावनात्मक जुड़ाव। आने वाली मर्दानी 3 को लेकर रानी ने कहा कि इसी फिल्म के साथ तीन दशक पूरे होना उनके लिए किसी संकेत से कम नहीं। यह फिल्म आज की महिलाओं की सोच और भारतीय पुलिस बल में महिला अधिकारियों के साहस को सलाम करने का जरिया बनेगी। अभिराज मीनावाला के निर्देशन में बनी और आदित्य चोपड़ा द्वारा निर्मित यह फिल्म 30 जनवरी 2026 को रिलीज़ होने वाली है।

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