देश के सबसे स्वच्छ शहरों में गिने जाने वाले इंदौर से एक गंभीर और चिंताजनक मामला सामने आया है। शहर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी पीने से अब तक सात लोगों की जान जा चुकी है, जबकि 40 से अधिक लोग बीमार बताए जा रहे हैं। उल्टी-दस्त से पीड़ित मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इंदौर के मेयर पुष्यमित्र भार्गव ने एक टीवी चैनल से बातचीत में स्वीकार किया कि जहरीले पानी के कारण सात लोगों की मौत हो चुकी है। हालांकि प्रशासन ने फिलहाल आधिकारिक तौर पर तीन मौतों की ही पुष्टि की है।

अस्पतालों और क्लीनिकों में उमड़ी भीड़
भागीरथपुरा क्षेत्र के संजीवनी क्लीनिक और आसपास के स्वास्थ्य केंद्रों में मरीजों की भारी भीड़ देखी जा रही है। सैकड़ों लोग उल्टी-दस्त, पेट दर्द और कमजोरी की शिकायत लेकर इलाज के लिए पहुंच रहे हैं। अब तक एक हजार से ज्यादा लोगों का उपचार किया जा चुका है।
लापरवाही पर कार्रवाई, अधिकारी सस्पेंड
मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री ने तत्काल कार्रवाई करते हुए जोनल अधिकारी और एक असिस्टेंट इंजीनियर को निलंबित कर दिया है, जबकि एक उपयंत्री की सेवाएं समाप्त कर दी गई हैं। साथ ही जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया गया है। मृतकों के परिजनों को दो-दो लाख रुपये मुआवजा देने की घोषणा भी की गई है।
नर्मदा पाइपलाइन में लीकेज बनी वजह
प्राथमिक जांच में सामने आया है कि भागीरथपुरा इलाके में नर्मदा जलापूर्ति पाइपलाइन में लीकेज हो गया था। इस दौरान शौचालय और ड्रेनेज का गंदा पानी पेयजल लाइन में मिल गया, जो सीधे लोगों के घरों तक पहुंचा। इसी पानी के सेवन से बड़ी संख्या में लोग बीमार पड़े।
पहले से मिल रही थीं शिकायतें
स्थानीय लोगों का कहना है कि वे कई दिनों से नलों से बदबूदार और गंदा पानी आने की शिकायत कर रहे थे, लेकिन समय रहते कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। 24 दिसंबर के बाद अचानक उल्टी-दस्त के मामले तेजी से बढ़ने लगे और स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई।
पाइपलाइन के ऊपर बना सार्वजनिक शौचालय
नगर निगम और स्वास्थ्य विभाग की शुरुआती रिपोर्ट में बड़ी लापरवाही उजागर हुई है। जिस मुख्य पाइपलाइन से पूरे इलाके में पानी सप्लाई होता है, उसके ऊपर ही सार्वजनिक शौचालय बना हुआ है। लीकेज के चलते ड्रेनेज सीधे पेयजल में मिल रहा था। कई जगह जल वितरण लाइन भी टूटी पाई गई है। गौरतलब है कि करीब चार महीने पहले ढाई करोड़ रुपये की लागत से नई मेन पाइपलाइन बिछाने के टेंडर पास हो चुके थे, लेकिन उन पर अमल नहीं किया गया—जिसका खामियाजा अब आम जनता को भुगतना पड़ रहा है।


