चीन ने अमेरिका को कड़े शब्दों में आगाह किया है कि यदि वह सैन्य दबाव, तकनीकी प्रतिबंधों या रणनीतिक गठबंधनों के जरिए चीन को झुकाने की कोशिश करता है, तो यह उसकी एक गंभीर रणनीतिक चूक साबित होगी। बीजिंग का साफ संदेश है—चीन अपनी संप्रभुता से जुड़े मुद्दों पर किसी भी बाहरी दखल को स्वीकार नहीं करेगा और जवाब अपने नियमों पर देगा। चीन के सरकारी नैरेटिव से जुड़े प्रमुख रणनीतिक विश्लेषक Victor Gao ने कहा कि चीन से जुड़े संवेदनशील मामलों में हस्तक्षेप करने वालों को परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए। गाओ चीन की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े थिंक-टैंक Center for China and Globalization के उपाध्यक्ष हैं और सरकारी सोच के प्रभावशाली प्रवक्ता माने जाते हैं।
ताइवान और परमाणु नीति पर सख्त संकेत
गाओ के बयान ऐसे समय आए हैं जब अमेरिका द्वारा Taiwan को दी जा रही सैन्य सहायता से एशिया-प्रशांत क्षेत्र में तनाव बढ़ा हुआ है। चीन की सरकारी मीडिया—जैसे Global Times और CGTN—ने इन बयानों को प्रमुखता से दिखाया है। उन्होंने चीन की परमाणु नीति का हवाला देते हुए कहा कि चीन “पहले परमाणु हमला न करने” की नीति पर कायम है, लेकिन यदि कोई देश पहले हमला करता है, तो चीन ऐसा जवाब देगा जिससे दूसरा हमला करने की क्षमता ही समाप्त हो जाएगी।
मिसाइल दावों से बढ़ी वैश्विक हलचल
गाओ ने दावा किया कि चीन के पास अत्याधुनिक मिसाइल क्षमताएं हैं, जो महज़ 20 मिनट में दुनिया के किसी भी कोने तक मार कर सकती हैं और जिन्हें रोक पाना लगभग असंभव है। उन्होंने कथित रूप से “एम-61” नाम की मिसाइल प्रणाली का जिक्र भी किया, जिसके बारे में कहा गया कि वह एक साथ कई परमाणु वारहेड और हाइड्रोजन बम ले जाने में सक्षम है।हालांकि इन दावों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल भी खड़े कर दिए हैं।
रूस का संकेत और रणनीतिक समीकरण
इसी बीच रूस के विदेश मंत्री Sergey Lavrov ने कहा कि यदि ताइवान को लेकर संघर्ष होता है और कोई तीसरा देश चीन के खिलाफ सीधे हस्तक्षेप करता है, तो Russia चीन की मदद करेगा। भले ही इसे औपचारिक सैन्य प्रतिबद्धता नहीं कहा गया हो, लेकिन पश्चिमी विश्लेषक इसे चीन–रूस रणनीतिक साझेदारी के मजबूत संकेत के रूप में देख रहे हैं।
विशेषज्ञों की राय: दबाव से ज़्यादा मनोवैज्ञानिक संदेश
वैश्विक सामरिक संस्थाओं का मानना है कि चीन के ये बयान वास्तविक सैन्य खुलासों से अधिक राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक दबाव की रणनीति का हिस्सा हैं।
Stockholm International Peace Research Institute और International Institute for Strategic Studies दोनों का कहना है कि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध विश्वसनीय स्रोतों में “एम-61” नामक किसी चीनी मिसाइल की स्वतंत्र पुष्टि नहीं होती।


